बेहरम फारूकी की ‘बेगम नामा’ नामक पुस्तक मुगल अभिलेखागार की पारंपरिक समझ को चुनौती देती है। यह पुस्तक मुगलकालीन दस्तावेजों के व्यवस्थित संग्रह पर सवाल उठाती है, जो अक्सर शाही दृष्टिकोण को ही दर्शाते हैं। फारूकी का तर्क है कि ये अभिलेख पूर्ण इतिहास नहीं, बल्कि सत्ता में बैठे लोगों द्वारा निर्मित एक चयनित विवरण हैं। ‘बेगम नामा’ में, फारूकी ने मुगल अभिलेखागार में मौजूद विसंगतियों और कमियों को उजागर किया है, विशेष रूप से महिलाओं से संबंधित दस्तावेजों की कमी को। यह शोध मुगल इतिहास के वैकल्पिक स्रोतों की खोज और अभिलेखागार की सीमाओं को समझने के महत्व पर जोर देता है। पुस्तक इतिहासकारों को मुगल काल के अधिक सूक्ष्म और समावेशी दृष्टिकोण के लिए प्रोत्साहित करती है, जो हाशिए पर धकेले गए आवाजों को भी शामिल करे। यह मुगल इतिहास के अध्ययन में एक महत्वपूर्ण योगदान है।
