कई लोगों ने विश्वविद्यालयों को केवल नौकरी के लिए तैयार करने वाले कारखानों के रूप में चित्रित किया है। सरकार भी उन अध्ययन कार्यक्रमों को बंद करने पर विचार कर रही है जिन्हें वर्तमान बाजार की ज़रूरतों के अनुसार प्रासंगिक नहीं माना जाता है। यह बहस विश्वविद्यालयों की भूमिका और भविष्य को लेकर है। क्या विश्वविद्यालय केवल रोज़गार के अवसर प्रदान करने पर ध्यान केंद्रित करें, या ज्ञान और अनुसंधान के केंद्र बने रहें? यह मुद्दा शिक्षा जगत में महत्वपूर्ण चर्चा का विषय है। सरकार का उद्देश्य शिक्षा प्रणाली को अधिक प्रासंगिक और प्रभावी बनाना है। इस नीति से कुछ कार्यक्रमों के अस्तित्व पर सवाल उठ सकते हैं, जबकि अन्य का मानना है कि यह विश्वविद्यालयों को अधिक केंद्रित और नवीन बनने के लिए प्रेरित करेगा। इस बदलाव का छात्रों और शिक्षा प्रणाली पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ेगा।