तीन अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने न्यायपालिका में हस्तक्षेप के प्रति आगाहा किया है। इन संगठनों ने सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों पर दबाव डाले जाने के आरोपों पर चिंता व्यक्त की है। हालांकि, इन समूहों ने संसद में इस विषय पर आयोजित चर्चा में भाग नहीं लिया। सांसदों ने इन आरोपों पर बहस की, लेकिन मानवाधिकार समूहों की अनुपस्थिति उल्लेखनीय रही। यह घटना न्यायपालिका की स्वतंत्रता और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए उठाए जाने वाले कदमों पर सवाल खड़े करती है। यह भी चिंताजनक है कि महत्वपूर्ण मुद्दों पर नागरिक समाज की भागीदारी सीमित क्यों है। इस मामले में आगे की जांच और पारदर्शिता की आवश्यकता है।