यह लेख लोकतांत्रिक समाजों में असंतोष के अधिकार पर प्रकाश डालता है, चाहे वह कितना भी कट्टर क्यों न हो। लेखक का तर्क है कि विरोध प्रदर्शन पूरी तरह से वैध हैं, लेकिन हिंसा अस्वीकार्य है। लोकतंत्र की नींव ही असहमति की अभिव्यक्ति पर टिकी है। किसी भी सरकार को अपनी नीतियों पर वैध आलोचना को दबाने का प्रयास नहीं करना चाहिए। यह मूल सिद्धांत है कि असंतोष को दबाने का प्रयास करने पर ही नुकसान होता है, जैसा कि "नो ताव" आंदोलन के संदर्भ में देखा गया है। लेखक का स्पष्ट संदेश यह है कि स्वस्थ लोकतंत्र में, बहस और विरोध आवश्यक हैं, लेकिन शांतिपूर्ण माध्यमों से ही किया जाना चाहिए। हिंसा लोकतंत्र को कमजोर करती है और संवाद को बाधित करती है।