यह लेख 'जागृति' की अवधारणा और इसके पतन पर प्रकाश डालता है। 'जागृति' एक ऐसा आंदोलन था जिसने सामाजिक न्याय और पहचान की राजनीति पर जोर दिया, लेकिन अब यह विवादों से घिरा है और प्रभावी नहीं रह गया है। लेखक का तर्क है कि वामपंथी विचारधारा को इस अवधारणा से छुटकारा पाना चाहिए और सार्वभौमिक मूल्यों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। ऐसा करने से, वामपंथी दूरगामी विचारधाराओं के खिलाफ अधिक प्रभावी ढंग से लड़ सकते हैं। लेख में चिंता व्यक्त की गई है कि वामपंथी अभी भी 'जागृति' को छोड़ने के लिए अनिच्छुक हैं, जो समय की कमी को दर्शाता है। एक नई रणनीति की आवश्यकता है जो सभी के लिए समावेशी हो और ध्रुवीकरण को कम करे।