अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते के बाद, मध्य पूर्व में संयुक्त राज्य अमेरिका का प्रभाव कम हो रहा है। पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप इस समझौते को अपनी उपलब्धि बता रहे हैं, जो युद्ध के बिना भी संभव था। हालांकि, इस समझौते की कीमत अरब देशों को चुकानी पड़ रही है। विश्लेषकों का मानना है कि अरब राष्ट्रों को यह कड़वा अनुभव हुआ है कि युद्ध के बाद का क्षेत्रीय व्यवस्था अमेरिका के बिना ही स्थापित होगी। यह समझौता दर्शाता है कि अमेरिका की नीतियां अब मध्य पूर्व में निर्णायक भूमिका नहीं निभा पाएंगी। इस स्थिति से क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में बदलाव आने की संभावना है। यह समझौता ईरान को क्षेत्रीय मामलों में अधिक सक्रिय भूमिका निभाने का अवसर प्रदान कर सकता है।
