दस जून को यह स्पष्ट हुआ कि देश के राजनेता भाषणों को सुपरमार्केट की खरीदारी सूची के समान ही सरल मानते हैं। यह स्थिति चिंताजनक है। विशेषज्ञों का मानना है कि राजनीतिक भाषणों में गुणवत्ता और गहराई का अभाव है। अक्सर, महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार किए बिना, भाषणों को केवल औपचारिकता निभाने के लिए तैयार किया जाता है। इस प्रवृत्ति से जनता का विश्वास कम हो सकता है और राजनीतिक संवाद कमजोर हो सकता है। यह आवश्यक है कि राजनेता भाषणों को अधिक गंभीरता से लें और उन्हें जनता को प्रेरित करने और सूचित करने के लिए एक प्रभावी उपकरण के रूप में उपयोग करें। इस मामले में सुधार की तत्काल आवश्यकता है।