पोप फ्रांसिस ने कहा है कि विदेशियों को सिर्फ इसलिए निकालना कि वे विदेशी हैं, ईसाई सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है। उन्होंने ‘पुनर्प्रवास’ (remigrazione) की अवधारणा की आलोचना करते हुए इसे अस्वीकार्य बताया है। पोप ने स्पष्ट किया कि ईसाई धर्म में दूसरों के प्रति स्वागत और करुणा का भाव महत्वपूर्ण है। उन्होंने जोर देकर कहा कि सभी मनुष्यों को सम्मान और गरिमा के साथ व्यवहार किया जाना चाहिए, चाहे उनकी राष्ट्रीयता कुछ भी हो। यह बयान ऐसे समय में आया है जब यूरोप में आप्रवासन और शरणार्थियों के मुद्दे पर बहस तेज हो रही है। पोप फ्रांसिस अक्सर प्रवासियों और हाशिए पर रहने वाले लोगों के अधिकारों की वकालत करते रहे हैं। उनका यह संदेश समावेशिता और मानवीय मूल्यों को बढ़ावा देने का एक प्रयास है।
