वर्तमान वित्तीय वर्ष के दौरान, सरकार ने राष्ट्रीय सभा में प्रतिनिधित्व न होने के बावजूद अपने 23 विधेयकों में से 21 को प्रतिनिधि सभा में पंजीकृत कराया। यह दर्शाता है कि सरकार विधेयक पंजीकरण के लिए ऊपरी सदन, राष्ट्रीय सभा की तुलना में निचले सदन, प्रतिनिधि सभा को प्राथमिकता देती है। सरकार के पास राष्ट्रीय सभा में कोई प्रतिनिधित्व नहीं है, इसलिए प्रतिनिधि सभा को विधेयक प्रस्तुत करने के लिए एक सुविधाजनक मंच माना गया। इस प्रवृत्ति से पता चलता है कि सरकार विधायी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिनिधि सभा पर अधिक निर्भर है। यह भी सवाल उठता है कि राष्ट्रीय सभा में प्रतिनिधित्व न होने से विधायी रणनीति कैसे प्रभावित होती है। सरकार का यह कदम विधायी प्रक्रिया में संतुलन और प्रतिनिधित्व के बारे में बहस को जन्म दे सकता है। भविष्य में, सरकार को राष्ट्रीय सभा में प्रतिनिधित्व बढ़ाने या विधायी प्रक्रिया को अधिक समावेशी बनाने के तरीकों पर विचार करने की आवश्यकता हो सकती है।