प्राथमिक विद्यालयों में माता-पिता के स्वयंसेवकों को दी जाने वाली प्राथमिकता योजना पर पिछले 28 वर्षों से सवाल उठ रहे हैं। आलोचकों का तर्क है कि यह योजना स्वैच्छिक सेवा के मूल भावना के विपरीत, एक लेन-देन की तरह दिखती है। यह सवाल उठ रहा है कि क्या इस तरह की प्राथमिकता देना उचित है या नहीं। कुछ लोगों का मानना है कि यह उन अभिभावकों को प्रोत्साहित करती है जो स्कूल के लिए समय निकालने को तैयार हैं। वहीं, अन्य लोगों का कहना है कि यह उन अभिभावकों के प्रति अनुचित है जो समय या अन्य कारणों से स्वयंसेवा नहीं कर सकते हैं। इस योजना के कारण स्कूल में समानता और निष्पक्षता पर भी बहस छिड़ गई है। इस मुद्दे पर आगे विचार-विमर्श और नीति में बदलाव की आवश्यकता है।