सरकार ने सांसदों के लिए निजी सचिवों की नियुक्ति फिर से बहाल कर दी है। यह निर्णय सुशीला कार्की सरकार द्वारा जेन ज़ेड आंदोलन के बाद लागू की गई नीति को उलट देता है। पूर्व में, सांसदों को निजी सचिव नियुक्त करने की अनुमति नहीं थी, लेकिन अब यह छूट फिर से दी गई है। इस कदम से सांसदों को प्रशासनिक और संसदीय कार्यों में सहायता मिलेगी। सरकार का तर्क है कि इससे विधायी प्रक्रिया अधिक सुचारू रूप से चलेगी। विपक्षी दलों ने इस निर्णय का स्वागत किया है, जबकि कुछ विशेषज्ञों ने इस पर सवाल उठाए हैं। यह निर्णय पारदर्शिता और जवाबदेही के मुद्दों को भी जन्म दे सकता है।