न्यायिक आयुक्त असमाह मुसा ने स्पष्ट किया है कि नागरिक मुकदमों के माध्यम से अटॉर्नी जनरल के अभियोजन संबंधी निर्णयों को चुनौती नहीं दी जा सकती। उनका कहना है कि अदालतें अभियोजन पक्ष के विवेकाधिकार को चुनौती देने के लिए उपयुक्त मंच नहीं हैं। यह निर्णय उन मामलों में महत्वपूर्ण है जहां व्यक्ति आपराधिक आरोपों को लेकर नागरिक अदालतों का सहारा लेने का प्रयास करते हैं। न्यायाधीश ने जोर देकर कहा कि अभियोजन निर्णय न्यायिक समीक्षा के दायरे में नहीं आते हैं जब तक कि वे कानून के खिलाफ न हों। इस फैसले से अटॉर्नी जनरल के अधिकारों को मजबूती मिलती है और यह स्पष्ट होता है कि अभियोजन प्रक्रिया में अदालतों की भूमिका सीमित है। यह निर्णय आगे के कानूनी विवादों के लिए एक मिसाल कायम कर सकता है।