ढाका में स्थित वह घर, जहाँ से पहली बार “राष्ट्र भाषा बांग्ला” का नारा उठाया गया था, आज जर्जर हालत में है। दीवारों से प्लास्टर झड़ रहा है, लकड़ी के ढांचे में दीमक लग गई है, और छतें कई जगहों पर पूरी तरह से गायब हो चुकी हैं। जो टिन की चादरें बची हैं, वे भी जंग खाकर नाममात्र की ही रह गई हैं। टूटी हुई टिन की बाड़ को पार करते ही, फर्श घास और खरपतवार से भर गया है। दीवारों पर शैवाल की परतें चढ़ गई हैं और एक पुराना बिस्तर वहीं पड़ा है। खिड़कियों के लोहे के ग्रिल चोरी हो चुके हैं और ईंटें भी गिर रही हैं। इस घर को देखकर अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता कि यह उसी व्यक्ति का निवास था जिसने पाकिस्तान की संविधान सभा में पहली बार बांग्ला भाषा… के लिए आवाज उठाई थी।

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