संसद अध्यक्ष अल्बान बागबिन ने यह स्पष्ट किया है कि विवादास्पद एलजीबीटीक्यू विधेयक पारित होने के बाद संसद ‘फंक्टस ऑफिसियो’ नहीं बन गई है। उन्होंने जोर देकर कहा कि राष्ट्रपति की सहमति से पहले संसद को विधायी मामलों पर पुनर्विचार करने का संवैधानिक और प्रक्रियात्मक अधिकार है। बागबिन ने उन दावों को खारिज कर दिया कि विधेयक पारित होने के बाद संसद की भूमिका समाप्त हो गई है। उनका कहना है कि संसद के पास कानून को अंतिम रूप देने की शक्ति है। यह स्पष्टीकरण विधेयक को लेकर चल रही बहस के बीच आया है, जिसमें कुछ लोगों का मानना है कि संसद अब इसमें कोई बदलाव नहीं कर सकती। स्पीकर ने संसद की विधायी प्रक्रिया पर अपनी शक्ति और नियंत्रण की पुष्टि की है। इस निर्णय से विधेयक के भविष्य और संभावित संशोधनों की संभावना बनी रहेगी।