एक समय था जब रसोई एक अलग दुनिया हुआ करती थी। सुबह की पहली किरण से पहले, आँगन के एक कोने में मिट्टी का चूल्हा जल उठता था। सूखे लकड़ी, पुआल या मकई के डंठल जलाकर दिन की खाना बनाना शुरू हो जाता था। चूल्हे का धुआँ हर तरफ फैल जाता था। उस धुएं में चावल की सुगंध, दाल का तड़का और मिट्टी के बर्तन में पके हुए सब्जी की खुशबू मिली रहती थी। आज की आधुनिक रसोई में यह दृश्य लगभग अपरिचित है। गैस स्टोव, इलेक्ट्रिक स्टोव और आधुनिक बर्तन आ गए हैं। आधुनिकता के इस दौर में पारंपरिक रसोई की यादें धुंधली होती जा रही हैं। यह बदलाव जीवनशैली में बदलाव का प्रतीक है।