चर्च ने आप्रवासन नीति पर पश्चिमी दुनिया में ही चर्चा शुरू की, वह भी अत्यधिक सैद्धांतिक स्तर पर। इसने आप्रवासन से जुड़े विकल्पों को अत्यधिक द्विध्रुवी बनाकर प्रस्तुत किया, जिससे स्थिति और जटिल हो गई। यह दृष्टिकोण केवल पश्चिमी देशों तक ही सीमित रहा, अन्य क्षेत्रों में इस पर ध्यान नहीं दिया गया। चर्च की यह प्रतिक्रिया आप्रवासन के मुद्दे को समझने और संबोधित करने में एक संकुचित परिप्रेक्ष्य दर्शाती है। इस द्विध्रुवीकरण ने समुदायों के लिए उचित समाधान खोजना मुश्किल बना दिया। पश्चिमी चर्च का यह रुख आप्रवासन नीति पर वैश्विक संवाद में एक महत्वपूर्ण कमी को दर्शाता है। इस विषय पर अधिक व्यापक और संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता है।