बातचीत के दौरान नज़रें चुराने को अक्सर झूठ बोलने से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन मनोविज्ञान के अनुसार यह हमेशा सच नहीं होता। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा कई कारणों से हो सकता है, जिनमें संज्ञानात्मक अधिभार यानी दिमाग पर बहुत ज़्यादा जानकारी का दबाव, सामाजिक चिंता और भावनात्मक प्रबंधन शामिल हैं। जब कोई व्यक्ति किसी जटिल विषय पर बात कर रहा होता है, तो दिमाग पर पड़ने वाले दबाव के कारण वह नज़रें चुरा सकता है। इसी तरह, सामाजिक चिंता से ग्रस्त लोग भी दूसरों से सीधी नज़र मिलाने में असहज महसूस कर सकते हैं। भावनात्मक रूप से परेशान व्यक्ति भी अपनी भावनाओं को नियंत्रित करने के प्रयास में नज़रें फेर सकता है। इसलिए, नज़रें चुराने को हमेशा झूठ का प्रमाण नहीं मानना चाहिए, बल्कि व्यक्ति की मानसिक स्थिति को समझने का प्रयास करना चाहिए। यह व्यवहार व्यक्ति के भीतर चल रही आंतरिक प्रक्रियाओं का संकेत हो सकता है।