कलाकारों को राजनीतिक दलों में शामिल करने के प्रयासों के बावजूद, कोई भी दल सुनने को तैयार नहीं हुआ। वक्ता ने कई बार राजनीतिक दलों को समझाया कि कलाकारों को एक अलग मंच पर रखा जाना चाहिए, लेकिन उनकी बात अनसुनी कर दी गई। यह स्थिति कलाकारों के लिए चिंताजनक है क्योंकि इससे उनकी रचनात्मक स्वतंत्रता सीमित हो सकती है। वक्ता ने इस मुद्दे पर अपनी निराशा व्यक्त की है और भविष्य में भी इस पर ध्यान देने की आवश्यकता बताई है। राजनीतिक हस्तक्षेप से कला और संस्कृति के विकास में बाधा आ सकती है। कलाकारों को अपनी कलात्मक पहचान बनाए रखने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। इस मामले में कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकला है।

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