प्राचीन इस्लामी शिक्षा प्रणाली अव्यवस्थित नहीं थी, बल्कि इसकी नियम प्रणाली भिन्न थी। उस समय शिक्षा का मुख्य केंद्र किसी दीवार से घिरे संस्थागत भवन नहीं थे। शिक्षा मौखिक परंपरा और गुरु-शिष्य संबंधों पर आधारित थी। ज्ञान मस्जिदों, दरगाहों और विद्वानों के घरों में फैलाया जाता था। यह प्रणाली लचीली थी और छात्रों की व्यक्तिगत आवश्यकताओं के अनुरूप थी। आधुनिक विश्वविद्यालयों की तरह, इसमें निश्चित पाठ्यक्रम या डिग्री नहीं थी। मुख्य उद्देश्य धार्मिक ज्ञान, नैतिकता और न्याय की शिक्षा प्रदान करना था।