मनोविज्ञानियों का मानना है कि साठ और सत्तर के दशक में जन्मे बच्चों में भावनात्मक दृढ़ता बेहतर पालन-पोषण की वजह से नहीं, बल्कि अपनी भावनाओं को स्वयं प्रबंधित करने की क्षमता विकसित करने के कारण बढ़ी। इस पीढ़ी के बच्चों को अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता दी गई थी और उन्हें अपनी समस्याओं का समाधान खुद खोजने के लिए प्रोत्साहित किया गया। विशेषज्ञों के अनुसार, इसी स्वायत्तता और समस्या-समाधान कौशल ने उन्हें जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार किया। उस समय के माता-पिता बच्चों पर कम नियंत्रण रखते थे, जिससे बच्चों को अपनी भावनाओं को समझने और उनसे निपटने का अवसर मिला। यह दृष्टिकोण आज के समय में बच्चों के पालन-पोषण से भिन्न है, जहाँ अक्सर अधिक संरचित और निर्देशित वातावरण प्रदान किया जाता है। शोध से पता चलता है कि भावनात्मक बुद्धिमत्ता और आत्मनिर्भरता का विकास बच्चों के समग्र कल्याण के लिए महत्वपूर्ण है।