25 वर्षीय किम लिंके का हाल ही में निधन हो गया, जो मायो/सीएफएस (Myalgic Encephalomyelitis/Chronic Fatigue Syndrome) नामक एक ऐसी बीमारी से जूझ रही थी जिसे कई चिकित्सक अभी भी स्वीकार नहीं करते हैं। उन्होंने इच्छामृत्यु का सहारा लिया। किम के माता-पिता ने बताया कि अपनी बीमारी के अंतिम महीनों में उन्होंने किस तरह की पीड़ा सहन की। वर्षों से वह इस बीमारी से लड़ रही थीं और अंततः एक सम्मानजनक अंत की तलाश में थीं। यह मामला जर्मनी में इच्छामृत्यु और दुर्लभ बीमारियों से पीड़ित लोगों के अधिकारों पर बहस को फिर से तेज करता है। किम की कहानी उनकी सहनशक्ति और पीड़ा दोनों को उजागर करती है। उनके माता-पिता ने उनकी इच्छा का सम्मान किया और उनकी यात्रा को सार्वजनिक करने का फैसला किया ताकि जागरूकता बढ़ाई जा सके। इस घटना से स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में सुधार और गंभीर रूप से बीमार रोगियों के लिए बेहतर सहायता की मांग बढ़ गई है।