सीरिया के घौटा और खान शेखून में हुए रासायनिक हमलों के पीड़ित आज भी न्याय के इंतज़ार में हैं। तेरह साल बीत जाने के बावजूद, इन हमलों के शिकार अपनी ज़िंदगी भर की चोटों और मानसिक आघात से जूझ रहे हैं। बशर अल-असद के क्रूर हमले तब भी जारी हैं, और पीड़ितों को ऐसा लग रहा है जैसे दुनिया ने उन्हें भुला दिया है। वे महसूस करते हैं कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय उनकी दुर्दशा पर ध्यान नहीं दे रहा है। इन हमलों में बचे लोगों का जीवन पूरी तरह से बदल गया है, और वे अभी भी शारीरिक और भावनात्मक पीड़ा से जूझ रहे हैं। पीड़ितों की निराशा इस तथ्य से और बढ़ जाती है कि हमलावरों को जवाबदेह नहीं ठहराया गया है। यह घटना सीरिया में मानवाधिकारों के उल्लंघन और अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप की आवश्यकता पर प्रकाश डालती है।

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