स्वीडन में जन्मे और स्वीडिश चर्च में पादरी, हंस उको (Hans Ucko) को अपनी नागरिकता खोने के बारे में जानकारी नहीं थी। उन्होंने नाज़ी अपराधों की भरपाई के रूप में जर्मन नागरिकता स्वीकार की, जिसके परिणामस्वरूप अनजाने में उनकी स्वीडिश नागरिकता समाप्त हो गई। 80 वर्षीय उको का कहना है कि स्वीडन वही कर रहा है जो जर्मनी ने उनके पिता के साथ किया था। यह मामला नागरिकता कानूनों और ऐतिहासिक अन्याय से संबंधित जटिल मुद्दों को उजागर करता है। उको ने जर्मन नागरिकता स्वीकार करते समय स्वीडिश नागरिकता खोने के निहितार्थों को नहीं समझा था। स्वीडिश अधिकारियों ने इस मामले पर अभी तक कोई विस्तृत प्रतिक्रिया नहीं दी है। यह घटना स्वीडन में नागरिकता नियमों की समीक्षा की मांग कर रही है।
