स्वीडिश साहित्यविद् मिया क्विरिन के अनुसार, 1970 के दशक से कविता एक रक्षात्मक स्थिति में है। उन्होंने गोटेबोर्ग विश्वविद्यालय में अपनी डॉक्टरेट शोध प्रबंध में पाया कि स्वीडिश कवि 1950 से कविता को कैसे परिभाषित करते रहे हैं। क्विरिन का तर्क है कि कविता को अक्सर इस बात से परिभाषित किया जाता है कि वह क्या *नहीं* है, न कि वह क्या है। उनका शोध दर्शाता है कि कविता की परिभाषा लगातार बदल रही है और यह स्थिर नहीं है। यह अध्ययन स्वीडिश कविता के विकास और उसकी सीमाओं को समझने में महत्वपूर्ण योगदान देता है। क्विरिन के शोध से पता चलता है कि कविता की पहचान उसकी नकारात्मक परिभाषाओं के माध्यम से भी आकार लेती है। यह कविता के स्वरूप और भविष्य पर एक नया दृष्टिकोण प्रदान करता है।
