एक हालिया सर्वेक्षण के अनुसार, 86 प्रतिशत जर्मन नागरिक अपने दैनिक जीवन में अधिक आक्रामकता महसूस कर रहे हैं। इस बढ़ते तनाव का कारण आश्चर्यजनक रूप से झगड़ों की अधिकता नहीं, बल्कि उनकी कमी है। रिपोर्ट बताती है कि लोग अपनी समस्याओं पर चर्चा नहीं कर रहे हैं, जिससे मानसिक तनाव बढ़ता जा रहा है। जब विवादों को सुलझाया नहीं जाता, तो वे भीतर ही जमा होते रहते हैं। अंततः यह संचित क्रोध एक सीमा तक पहुँचकर विस्फोट का रूप ले लेता है। विशेषज्ञों का मानना है कि हम न केवल कम झगड़ रहे हैं, बल्कि झगड़ने का तरीका भी गलत है। यह स्थिति समाज में मानसिक स्वास्थ्य और आपसी संवाद की आवश्यकता को रेखांकित करती है।