सुदूरपश्चिम प्रांतीय विधानसभा ने भारी मात्रा में, लगभग ₹14 करोड़ खर्च किए, लेकिन एक भी विधेयक पारित नहीं किया और न ही बजट को मंजूरी दी। सदस्यों का कहना है कि कानून बनाना न तो प्रांतीय सरकार की प्राथमिकता थी और न ही विधानसभा की। यह स्थिति चिंताजनक है क्योंकि इससे विकास कार्यों में बाधा आ सकती है और जनता के प्रति जवाबदेही पर सवाल उठ सकते हैं। खर्च का विवरण अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है, जिससे पारदर्शिता को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। इस निष्क्रियता के कारण क्षेत्र के विकास की गति धीमी हो सकती है। विधानसभा के इस प्रदर्शन पर विपक्षी दलों ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। आगामी सत्र में इस मुद्दे पर गरमागरम बहस होने की संभावना है।