हाल ही में हुए एक अध्ययन से पता चला है कि सरकार ने फुटबॉल स्टेडियमों पर भारी मात्रा में धन खर्च किया है, लेकिन दर्शक अपेक्षित संख्या में नहीं आ रहे हैं। शुरुआती दौर में लोगों में नए स्टेडियम को लेकर उत्सुकता देखी गई और कई लोग देखने गए, लेकिन यह उत्साह जल्दी ही ठंडा पड़ गया। पाँच साल बाद भी स्टेडियम दर्शकों से गुलज़ार नहीं हैं, जिससे सरकारी निवेश पर सवाल उठने लगे हैं। यह अध्ययन इस बात पर प्रकाश डालता है कि केवल स्टेडियम का निर्माण ही सफलता की गारंटी नहीं है। दर्शकों को आकर्षित करने और बनाए रखने के लिए निरंतर प्रयास करने की आवश्यकता है। इस खर्च से बेहतर होता कि इन पैसों का इस्तेमाल खेल के विकास और प्रतिभाओं को निखारने में किया जाता। अब यह देखना होगा कि क्या यह निवेश कभी आर्थिक रूप से फायदेमंद साबित होता है।