अपराध खुफिया विभाग के प्रमुख मेजर जनरल फ़ेरोज़ खान ने एक गोपनीय न्यायिक आदेश प्राप्त करने के लिए अदालत में अर्ज किया था, जिसका उद्देश्य अदालत की कार्यवाही को गुप्त रखना था। हालाँकि, मडलंगा आयोग ने तुरंत ही कानूनी रूप से इसका विरोध किया। खान का यह कदम विवादित साबित हुआ और उनकी रणनीति विफल रही। आयोग ने अदालत में मजबूत तर्क प्रस्तुत किए, जिससे खान की गोपनीय आदेश की मांग खारिज हो गई। इस मामले ने जवाबदेही और पारदर्शिता के मुद्दों को उजागर किया है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि खान का यह प्रयास कानूनी रूप से कमजोर था और इससे उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा है। इस घटनाक्रम ने अपराध खुफिया विभाग के भीतर जवाबदेही की बहस को जन्म दिया है।