द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, सोवियत संघ ने अमेरिका द्वारा जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर गिराए गए परमाणु बमों की विनाशकारी क्षमता को महसूस किया। इसके परिणामस्वरूप, सोवियत संघ ने अपना परमाणु हथियार विकसित करने पर विशेष ध्यान देना शुरू कर दिया। इस कार्यक्रम के लिए आवश्यक यूरेनियम की खदानों में काम करने के लिए, युद्धबंदियों का इस्तेमाल किया गया। दस्तावेजों से पता चलता है कि कम्युनिस्ट शासन ने जानबूझकर खदानों में काम करने के लिए कैदियों की संख्या बढ़ाई, ताकि यूरेनियम का उत्पादन बढ़ाया जा सके। यह सोवियत परमाणु शस्त्रागार के निर्माण में एक महत्वपूर्ण योगदान था। यह खुलासा सोवियत शासन के तहत मानवाधिकारों के उल्लंघन और परमाणु हथियारों की दौड़ में उसकी भागीदारी को दर्शाता है। इस प्रथा ने युद्धबंदियों के जीवन को खतरे में डाल दिया और उन्हें अमानवीय परिस्थितियों में काम करने के लिए मजबूर किया।