दार्शनिक लूक फ़ेरी के अनुसार, बच्‍चों के प्रति आज की संवेदनशीलता मध्‍ययुगीन समाज में मौजूद नहीं थी। उनका कहना है कि बच्‍चों के प्रति हमारा वर्तमान दृष्टिकोण 19वीं सदी के अंत में ही विकसित हुआ। हाल ही में हुई लिहाना नामक बच्‍ची की गुमशुदगी पर लोगों की सहानुभूति और प्रतिक्रिया इसी बदलाव का परिणाम है। मध्‍ययुगीन काल में ऐसी घटनाओं पर इस तरह की प्रतिक्रियाएं नहीं देखी जाती थीं। फ़ेरी का तर्क है कि बच्‍चों के प्रति हमारी बदलती धारणा, समाज में आए गहरे बदलावों को दर्शाती है। यह बदलाव, बच्‍चों को अब केवल जीवित रहने के लिए ज़रूरी नहीं, बल्कि एक संवेदनशील और संरक्षित इकाई के रूप में देखने से संबंधित है। इस प्रकार, बच्‍चों के प्रति हमारी प्रतिक्रियाएं, सामाजिक और दार्शनिक विकास का परिणाम हैं।