शिदा बाज़ार को कभी भी “प्रवासी साहित्य” के लेबल से कोई लगाव नहीं रहा—उनके नए उपन्यास में, वे दर्शाती हैं कि सवाल कि कोई व्यक्ति कहाँ से आया है, वास्तव में सभी मनुष्यों के लिए लागू होता है। यह उपन्यास उन्हें जर्मन बुक प्राइज जीतने की प्रबल दावेदार बनाता है। बाज़ार का नवीनतम कार्य पहचान और उत्पत्ति की जटिलताओं की पड़ताल करता है, यह सुझाव देता है कि ये मुद्दे केवल प्रवासियों तक ही सीमित नहीं हैं। उपन्यास, “दी लूकन” (Die Lücken), मानवीय अस्तित्व के सार्वभौमिक प्रश्नों को उठाता है। यह कृति इस मान्यता पर बल देती है कि हर किसी की अपनी कहानी होती है, और हर किसी की पृष्ठभूमि मायने रखती है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह उपन्यास जर्मन साहित्यिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण योगदान है। बाज़ार के काम को महत्वपूर्ण प्रशंसा मिल रही है और पुरस्कार जीतने की प्रबल संभावना है।