जुलाई में वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में 20% की वृद्धि के बावजूद भारतीय रुपये में गिरावट को सीमित रखने में सफल रहा। यह सफलता मुख्य रूप से पूंजी प्रवाह और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा उठाए गए सक्रिय कदमों के कारण हुई। RBI ने रुपये को स्थिर रखने के लिए बाजार में हस्तक्षेप किया और डॉलर की आपूर्ति बढ़ाई। विदेशी पूंजी का निरंतर प्रवाह भी रुपये को सहारा देने में महत्वपूर्ण रहा। विशेषज्ञों का मानना है कि RBI की सक्रिय नीतियां और पूंजी प्रवाह के बिना रुपये में बड़ी गिरावट आ सकती थी। हालांकि, तेल की कीमतों में आगे की वृद्धि रुपये के लिए चुनौती बनी रहेगी। RBI आने वाले महीनों में भी रुपये की स्थिरता बनाए रखने के लिए सतर्क रुख अपनाएगा।