नॉर्वे के लेखक ओइस्टीन सोल्वांग का कहना है कि नफ़रत अचानक नहीं पनपती। इसकी शुरुआत विचारों और बयानों की सीमाओं को बदलने से होती है। पहले, लोग खुलकर अपनी राय व्यक्त करते थे, लेकिन अब माहौल बदल गया है। सोल्वांग के अनुसार, जब बोलने की आज़ादी पर रोक लगने लगती है, तो धीरे-धीरे कार्यों की सीमाएं भी बदलने लगती हैं। यह बदलाव समाज में नफ़रत और असहिष्णुता को बढ़ावा देता है। लेखक ने इस बात पर चिंता जताई है कि सार्वजनिक बहस में चरमपंथी विचारों को जगह मिल रही है, जिससे सामान्य बातचीत भी मुश्किल हो गई है। उन्होंने चेतावनी दी है कि इस प्रवृत्ति को रोकने के लिए तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है, अन्यथा इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
