सार्वजनिक जीवन में बहिष्कार और रद्द करने की संस्कृति मजबूत हो रही है। विरोधियों के साथ संवाद स्थापित करना अब पहले से ज़्यादा मुश्किल हो गया है। यह स्थिति 'सहिष्णुता' के नाम पर उत्पन्न हुई है, लेकिन वास्तव में यह एक जाल और खतरा बन गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि विचारों के टकराव से बचने के बजाय, अब उन्हें दबाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। इससे समाज में ध्रुवीकरण और बढ़ रहा है, और स्वस्थ बहस की संभावना कम हो रही है। इस माहौल में, असहमति को शत्रुता के रूप में देखा जा रहा है, जिससे रचनात्मक संवाद की संभावना समाप्त हो रही है। यह प्रवृत्ति लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए हानिकारक हो सकती है।
