पाब्लो नेरुदा के शब्दों के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि खेल केवल बच्चों तक सीमित नहीं है। आमतौर पर खेल को बचपन से जोड़ा जाता है, लेकिन यह जीवन के हर पड़ाव पर महत्वपूर्ण है। मनोविज्ञान की विभिन्न धाराएं इस बात का समर्थन करती हैं कि खेल वयस्क जीवन में भी एक अहम भूमिका निभाता है। जो व्यक्ति बड़े होने पर खेलना छोड़ देता है, वह अपने भीतर के उस मासूम बच्चे को खो देता है। मानसिक संतुलन और खुशी के लिए खेल की निरंतरता आवश्यक है। यह दृष्टिकोण खेल को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक आवश्यकता के रूप में प्रस्तुत करता है। अतः, जीवन भर सक्रिय और जिज्ञासु बने रहने के लिए खेल का महत्व बना रहता है।
