फ़िलीपे सैंड्स की नई पुस्तक "रुआ दे लंडन, 38" 1998 में जनरल पिनोशे की गिरफ्तारी और उसके बाद के परिणामों की पड़ताल करती है। यह पुस्तक इस घटना के अंतरराष्ट्रीय कानून पर पड़े गहरे प्रभाव पर प्रकाश डालती है। सैंड्स बताते हैं कि कैसे पिनोशे की गिरफ्तारी ने मानव अधिकारों के हनन के लिए जिम्मेदार लोगों को न्याय के कटघरे में लाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया। हालांकि, पिनोशे का प्रत्यर्पण अंततः विफल रहा, जो अंतरराष्ट्रीय न्याय प्रणाली में चुनौतियों को दर्शाता है। यह प्रकरण सार्वभौमिक क्षेत्राधिकार के सिद्धांतों और राजनीतिक विचारों के बीच जटिल संतुलन को भी उजागर करता है। पुस्तक पिनोशे के मामले की कानूनी और राजनीतिक बारीकियों की गहन जांच प्रस्तुत करती है, जिससे अंतरराष्ट्रीय कानून के विकास को समझने में मदद मिलती है। यह एक ऐसे समय की कहानी है जब अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने व्यक्तिगत जिम्मेदारी और जवाबदेही के नए मानकों को स्थापित करने का प्रयास किया।