वर्ष 2011 में हुलु लांगट में आए विनाशकारी भूस्खलन की यादें आज भी फोटोग्राफर ऐजुद्दीन साद को परेशान करती हैं। इस त्रासदी को बीते पंद्रह साल हो चुके हैं, लेकिन मलबे में दबे बच्चों की दर्दनाक चीखें उनके जेहन से नहीं निकली हैं। ऐजुद्दीन ने उस भयावह घटना को अपने कैमरे में कैद किया था, जिसने उन्हें गहरे मानसिक प्रभाव में डाल दिया। वह बताते हैं कि बच्चों की वे बेबस पुकारें आज भी उनके कानों में गूंजती रहती हैं। यह घटना दर्शाती है कि प्राकृतिक आपदाओं का प्रभाव केवल भौतिक नुकसान तक सीमित नहीं होता। इस त्रासदी के गवाह रहे फोटोग्राफर के लिए यह अनुभव एक जीवनभर का मानसिक बोझ बन गया है। यह कहानी आपदा के बाद बचे लोगों और गवाहों के मानसिक संघर्ष को उजागर करती है।