हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ऑर्बन ने 2009 में सत्ता संभालने से पहले अपनी रणनीति स्पष्ट रूप से बताई थी। उन्होंने सत्ता हासिल करने और उसे बनाए रखने के लिए तीन महत्वपूर्ण तत्वों - धन, विचारधारा और वोटों - पर जोर दिया था। ऑर्बन की सरकार ने धीरे-धीरे हंगरी के संस्थानों पर नियंत्रण स्थापित किया, जिससे लोकतांत्रिक मानदंडों और मूल्यों पर सवाल उठने लगे। उनकी 'अ-उदारवादी' प्रणाली, जिसे राष्ट्रीय संप्रभुता और पारंपरिक मूल्यों पर केंद्रित बताया जाता है, ने यूरोपीय संघ के साथ तनाव भी पैदा किया है। आलोचकों का तर्क है कि इस प्रणाली ने भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया है और नागरिक समाज की स्वतंत्रता को सीमित किया है। ऑर्बन की विरासत हंगरी के भविष्य और यूरोपीय राजनीति पर एक महत्वपूर्ण प्रभाव डालती रहेगी। यह रणनीति हंगरी की राजनीतिक और सामाजिक संरचना को गहराई से प्रभावित कर रही है।