संरक्षण संशोधन विधेयक ने देश के सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों और अर्थव्यवस्था के एक बड़े हिस्से को वाणिज्य विभाग (DoC) के अधीन छोड़ने की चिंता जताई है। यह विधेयक स्वतंत्र निगरानी के अभाव को दर्शाता है, जिससे संरक्षण प्रयासों की प्रभावशीलता पर सवाल उठ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस व्यवस्था में हितों के टकराव की संभावना है और पारदर्शिता की कमी हो सकती है। विधेयक में स्वतंत्र मूल्यांकन और जवाबदेही तंत्र का अभाव है, जो दीर्घकालिक संरक्षण लक्ष्यों के लिए हानिकारक हो सकता है। आलोचकों का कहना है कि यह संशोधन प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन में सरकारी नियंत्रण को बढ़ाता है। इस विधेयक के कारण संरक्षण नीतियों के निर्माण और कार्यान्वयन में नागरिक समाज और विशेषज्ञों की भूमिका सीमित हो सकती है। इस मुद्दे पर आगे बहस और समीक्षा की आवश्यकता है।