बालेन्द्र शाह की सरकार ने अपने शुरुआती 100 दिनों में विदेशी राजनयिकों के साथ संप्रभु समानता का प्रदर्शन किया। इस अवधि के दौरान सरकार ने एक विशिष्ट और आदर्शवादी राजनयिक दृष्टिकोण अपनाने की कोशिश की। हालांकि, यह रणनीति केवल प्रतीकात्मक स्तर पर ही प्रभावी रही। समय के साथ, सरकार को इस बात का एहसास हुआ कि केवल सिद्धांतों से काम नहीं चलता। अंततः, व्यावहारिक कूटनीति की आवश्यकता महसूस की गई। अब प्रशासन को औपचारिक निमंत्रण प्राप्त करने के लिए वास्तविक प्रयास करने पड़े। यह बदलाव दर्शाता है कि आदर्शवाद को अंततः जमीनी हकीकत और प्रशासनिक आवश्यकताओं के सामने झुकना पड़ा।