लगभग चार दशकों से, विशेष रूप से शीत युद्ध के अंत के बाद से, नवउदारवाद वैश्विक आर्थिक व्यवस्था की आधारशिला रहा है। विनियमन में कमी, निजीकरण, व्यापार उदारीकरण और बाजार की श्रेष्ठता में विश्वास इसके प्रमुख घटक थे। हालांकि, हाल के वर्षों में, इस मॉडल की प्रभावशीलता और न्यायसंगतता पर सवाल उठने लगे हैं। वैश्विक वित्तीय संकट, बढ़ती असमानता और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों ने नवउदारवादी नीतियों की सीमाओं को उजागर किया है। अब, दुनिया एक नए आर्थिक दृष्टिकोण की ओर बढ़ रही है, जिसमें राज्य का हस्तक्षेप, सामाजिक न्याय और पर्यावरणीय स्थिरता पर अधिक जोर दिया जा रहा है। यह बदलाव वैश्विक अर्थव्यवस्था के भविष्य को आकार देगा और विभिन्न देशों के लिए अलग-अलग रास्ते खोल सकता है। इस नए युग में, सरकारों को अधिक सक्रिय भूमिका निभानी होगी और समावेशी विकास को बढ़ावा देना होगा।