नार्वे में एक नई बहस छिड़ गई है कि क्या लोगों को मांस खाना बंद कर देना चाहिए। एक महिला ने इस मुद्दे पर "ज़िम्मेदारी का चोगा" ओढ़ लिया है और वह इस पर खुलकर अपनी राय रखने को तैयार है। फिलहाल, यही स्पष्ट नहीं है कि वह इस बहस में कितनी सफ़ल होगी। यह मामला खाद्य पदार्थों की पसंद और पर्यावरण पर उनके प्रभाव के बारे में एक बड़े सवाल को जन्म देता है। इस बहस से यह भी पता चलता है कि आधुनिक समाज में व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी और सामूहिक कल्याण के बीच संतुलन बनाए रखना कितना मुश्किल है। यह देखना दिलचस्प होगा कि यह मुद्दा आगे कैसे विकसित होता है और लोगों की खाने की आदतों को कैसे प्रभावित करता है। इस विषय पर विभिन्न वर्गों से प्रतिक्रियाएँ आने की संभावना है।