बीते रविवार को हुई घटना में, व्यक्ति पर कोई गंभीर अपराध नहीं था। केवल सार्वजनिक शांति भंग और शोर-शराबा करने का आरोप था, जिसके लिए अगर वह जीवित रहता तो शायद मुकदमा भी नहीं चलता। यह घटना जल्दबाजी में फैसले लेने के खिलाफ एक सवाल उठाती है। बिना पूरी जांच और सबूतों के किसी को भी दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए। व्यक्ति के बचने की संभावना को भी ध्यान में रखना आवश्यक है। इस घटना से न्याय व्यवस्था और सार्वजनिक धारणा पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। त्वरित निष्कर्षों से बचना चाहिए और सत्य की खोज में सावधानी बरतनी चाहिए।