वामपंथी विचारधारा अक्सर मानवीय ईर्ष्या पर आधारित रही है। आश्चर्यजनक रूप से, वर्ग द्वेष के कारण लाखों मौतों के अनुभव के बावजूद, यह विचारधारा आज भी लोकप्रिय है। नस्लीय श्रेष्ठता पर आधारित विचारधाराओं के विपरीत, इसे व्यापक रूप से सामाजिक स्वीकृति भी प्राप्त है। इसके समर्थक मीडिया, विश्वविद्यालयों और राजनीति में प्रमुखता से मौजूद हैं, जबकि नस्लवादी या राष्ट्रवादी विचारधाराओं के समर्थकों की तरह इन्हें तिरस्कार नहीं किया जाता। यह लेख वामपंथी विचारधारा में निहित कथित पाखंड और इसके सामाजिक प्रभाव पर प्रकाश डालता है। यह तर्क देता है कि वर्ग द्वेष के कारण हुए ऐतिहासिक नुकसान के बावजूद, वामपंथी विचारधारा को अनुचित रूप से अधिक स्वीकृति मिलती है। लेख में इस असमान व्यवहार पर सवाल उठाया गया है और इस पर विचार करने का आह्वान किया गया है कि क्यों वामपंथी विचारधारा के समर्थकों को समान आलोचना का सामना नहीं करना पड़ता है।