ख़ैबर पख़्तूनख़्वा (केपी) सरकार द्वारा हाल ही में एक कानून पेश किया गया है, जिसके तहत प्रांतीय विधान सभा सदस्यों (एमपीए) को कई विशेष विशेषाधिकार मिलने वाले हैं। इस क़ानून में एमपीए के लिए सरकारी सुविधाओं, सुरक्षा और अन्य लाभों में वृद्धि का प्रावधान है। विपक्षी दलों और विश्लेषकों ने इस क़ानून की कड़ी आलोचना की है, यह तर्क देते हुए कि यह जनता के पैसे का दुरुपयोग है और सरकारी संसाधनों पर अनावश्यक बोझ डालेगा। उनका कहना है कि यह क़ानून एमपीए को जवाबदेही से बचाता है और भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे सकता है। आलोचकों का यह भी मानना है कि इस क़ानून से केपी सरकार की पारदर्शिता और नैतिक मूल्यों पर प्रश्नचिह्न लग गया है। सरकार का तर्क है कि ये विशेषाधिकार एमपीए को प्रभावी ढंग से काम करने और जनता की सेवा करने में मदद करेंगे। हालांकि, इस क़ानून को लेकर जनता में असंतोष और बहस जारी है।