खुफिया विभाग के निलंबित महानिरीक्षक इम्तियाज फ़ाज़ेल के खिलाफ कथित दुराचार की जांच में बहुत कम प्रगति हुई है। उनकी कानूनी और संसदीय लड़ाईयाँ अनसुलझी बनी हुई हैं, जिसके कारण एक अरब रैंड से अधिक के गुप्त खुफिया निधि के खर्च पर पिछले एक साल से अधिक समय से उचित निगरानी नहीं रखी जा सकी है। यह मामला वित्तीय पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करता है। जांच में देरी के कारण सार्वजनिक धन के दुरुपयोग की आशंका बढ़ गई है। संसदीय समितियों ने इस मामले पर चिंता व्यक्त की है और तत्काल जवाबदेही की मांग की है। यह स्थिति राष्ट्रीय सुरक्षा और लोकतांत्रिक सिद्धांतों के लिए हानिकारक हो सकती है। सरकार पर दबाव बढ़ रहा है कि वह इस मामले की निष्पक्ष और त्वरित जांच सुनिश्चित करे।

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