भारत के पहले मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के कार्यकाल में लगभग 28 लाख महिलाओं को मतदाता सूची से बाहर रखा गया था। इस चौंकाने वाले खुलासे से चुनाव प्रक्रिया में लैंगिक असमानता पर गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं। यह घटना तब हुई जब 'नो सर' का प्रचलन नहीं था, जिससे यह प्रश्न उठता है कि उस समय नियमों का पालन कैसे किया गया था। इस चूक के कारण कई योग्य भारतीय नागरिकों को अपने मताधिकार से वंचित होना पड़ा। चुनाव आयोग इस मामले की जांच कर रहा है कि ऐसा कैसे हुआ और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं। यह घटना भारत में निष्पक्ष और समावेशी चुनावों के महत्व पर प्रकाश डालती है, जहां हर नागरिक को अपनी आवाज उठाने का अधिकार होना चाहिए। इस मामले ने राजनीतिक हलचल मचा दी है, और सभी पार्टियां जवाबदेही की मांग कर रही हैं।