यह लेख राजनीतिक छल की एक निरंतर प्रक्रिया पर प्रकाश डालता है, जिसमें किसी आग्रह को राजनीतिक मुद्दे के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इसमें यह दावा किया गया है कि समस्याएँ स्वचालित रूप से हल हो जाएँगी, यह मानकर कि एक द्विदलीय प्रणाली अभी भी मौजूद है। लेखक का तर्क है कि यह एक भ्रम है, क्योंकि वास्तविक द्विदलीय प्रणाली अब अस्तित्व में नहीं है। यह छल, राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने और वास्तविक समाधानों से ध्यान हटाने का एक तरीका है। लेख में इस बात पर जोर दिया गया है कि समस्याओं को हल करने के लिए अधिक यथार्थवादी और प्रभावी दृष्टिकोण की आवश्यकता है। यह स्थिति, राजनीतिक विमर्श में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी को दर्शाती है।