1960 के दशक की शुरुआत में, एक नाराज़ पाठक ने फ्रांसीसी व्यंग्य पत्रिका ‘हारा-किरी’ के संपादकों को एक पत्र लिखा, जिसकी स्थापना फ़्रांस्वा कावाना और जॉर्जेस बर्नीर ने की थी। पाठक ने पत्रिका में प्रकाशित सामग्री पर अपनी घृणा व्यक्त करते हुए संपादकों को “मूर्ख और दुष्ट” कहा। हैरानी की बात है कि संपादकों को इससे कोई ठेस नहीं पहुँची, बल्कि उन्होंने… इस विषय पर आगे की जानकारी ‘ला सिल्ला वाकिया’ पर उपलब्ध है। यह घटना फ्रांसीसी मीडिया और सार्वजनिक राय के बीच एक दिलचस्प संवाद को दर्शाती है। पत्रिका ‘हारा-किरी’ के संपादकों ने पाठक की आलोचना को रचनात्मक रूप से लिया। इस घटना से पता चलता है कि कैसे व्यंग्य और आलोचना एक दूसरे से जुड़े होते हैं। यह कहानी मीडिया में नज़रअंदाज़ करने की राजनीति और सार्वजनिक प्रतिक्रिया पर भी प्रकाश डालती है।