इतिहासकार मेथियास कोबेर्रोड रासमुसेन के अनुसार, वामपंथी लंबे समय से आप्रवासियों को श्रमिक वर्ग के प्रतीकात्मक समकक्ष के रूप में देखते आए हैं। इस धारणा ने बहुसंस्कृतिवाद की एक आदर्शवादी छवि को जन्म दिया है और धार्मिक समूहों के प्रति संवेदनशीलता पैदा की है। रासमुसेन का तर्क है कि वामपंथियों को इस दृष्टिकोण का पुनर्मूल्यांकन करने की आवश्यकता है। उन्होंने यह भी कहा कि बहुसंस्कृतिवाद की अवधारणा को लेकर वामपंथियों में एक भोलापन रहा है। यह पुनर्मूल्यांकन धार्मिक समूहों के साथ अधिक खुली और आलोचनात्मक बातचीत की अनुमति देगा। इस बदलाव से वामपंथी विचारधारा अधिक यथार्थवादी और प्रभावी हो सकती है।